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| ये नजदीकियां -अभी नहीं बनी हैं दूरियां ! |
लोग बदले हैं नीतियां बदली हैं। काम काज के तरीके बदले हैं। जिसके नतीजे एक दम तो नहीं दिख सकते, मगर अखबारों की ख़बरें अब सुबह से हाजमा खराब और तनाव देने वाली नहीं होती। सामाजिक विषमता की विषबेल रोज फलती फूलती नहीं दिखाई देती। सामाजिक भेदभाव और जहर घोलती सरकारी घोषणाएँ और तुष्टि-पुष्टिकरण के समाचार अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बनते।
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| सबकी निगाहें अलग -लक्ष्य सबके एक ! |
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| दिल्ली केचुनाव की घोषणा से पहले अन्ना के साथ रालेगनसिद्धि में लेखक ! अन्ना तब भी दिल्लीके मुद्दे आन्दोलन पर कुछ नहीं बोले ! |
किरण बेदी अब जनता के बीच आयीं हैं ,एक बड़ी जिम्मेदारी सम्हालने के लिए ,तो उन्हें यह साबित भी करना है वह वैचारिक तौर पर तब क्यों अरविन्द केजरीवाल के साथ थीं ,जब नरेंद्र मोदी देश मे बदलाव के लिए उन्हें मौका दिये जाने की अपील कर रहे थे और आज क्यों उनके खिलाफ हैं ? खिलाफ हैं भी यां नहीं ?
इन दोनों ने क्या जनलोकपाल जैसे तमाम मुद्दे छोड़ दिए हैं?छोड़ भी दिए हैं तो कोई हर्ज नहीं ,मगर एक दुसरे के खिलाफ क्यों हैं? एक टीम का सदस्य होने के नाते किरण बेदी की ही जिम्मेदारी ज्यादा बनती है कि वह अरविन्द केजरीवाल को अपने साथ लायें । उम्र, तजुर्बे में बड़ी होने के साथ एक महिला होने के नाते भी उन्हें इस बात की भरपूर कोशिश करनी चाहिए की आज अगर दिल्ली को सम्हालने की जिम्मेदारी उन्हें मिलने का बेहतरीन अवसर मिला है तो सबसे पहले अपने वैचारिक सहोगियों को साथ लेकर चलें। इनमें अरविन्द केजरीवाल सबसे प्रमुख हैं। वह सिर्फ भटके हुए हैं।अब किरण बेदी एक अहम् मुकाम और जिम्मेदारी के लिए जनता के बीच उम्मीद बंधाने को आगे आ रही हैं तो उन्हें सबसे पहले अपनी सांगठनिक क्षमता भी साबित करनी है ,और जिसकी शुरुआत सबसे पहले अरविन्द केजरीवाल जैसे अपने सहयोगी को साथ लेकर करनी होगी ,उनका विरोध करने का तो कोई आधार उनके पास है ही नहीं।
क्योंकि टीम अन्ना के यही दो सारथी आमने-सामने हैं । बाकी एक साथ ,चाहे वह खुद आये या अपनी सोच बदली या उन्हें सही रास्ते पर लाया गया -मगर आये एक मंच पर। बाबारामदेव,शाजिया बिन्नी और भी बहुत से लोग हैं। अरविन्द केजरीवाल को वह कारण बिबताने देने का मौक़ा देना चाहिए की आखिर जब उनकी बाकी टीम वैचारिक आधार पर उनसे अलग होकर भारतीय जनता पार्टी के साथ खडी है तब किस आधार पर वह टीम अन्ना के नेता बने और उन भरोसा करके दिल्ली ने जो जो सत्ता उन्हें सौंपी तो आखिर किस आधार पर उन्हने उसका मज़ाक उड़ा कर एक संवैधानिक रूप से निर्वाचित सरकार को अपने मनमाने और सिरफिरे ढंग से छोड़ दिया और किस बेशर्मायी पूर्ण तरीके के वह फिर दिल्ली पर राज करना चाहते हैं?
अरविन्द केजरीवाल ने एक काम तो किया है। राजनीतिक सत्ता की मनमानी के खिलाफ कैसे जनमत जाग्रत किया जाये और किस तरह से सता को खबरदार किया जाए ,इसका हताश हिन्दुस्तान को रास्ता दिखाने का काम करने का श्री उन्हें ही है। मगर अब उनके सहयोगियों की भी जिम्मेदारी बनती है की वह एक बार उन्हें अपने साथ आने का भी न्यौता दें ,जिनके साथ वह कल तक खड़े थे। और इस इस जिम्मेदारी का सबसे बड़ा जिमा फिलहाल किरण बेदी के पास है। अरविन्द मना करें ,उनकी अपील ठुकरायें ,यह उनका विहस्य है और अगर ऐसा होता तो कमसे कम रास्ते अलग तो होते हैं -फ़िलहाल दोनों एक रास्ते पर हैं -जो सिर्फ दिल्ली की सता को जाता है -जनता की ओर तो किसी का रुख ही नहीं हैं। !
-आशीष अग्रवाल
नीचे दिये Links पर पढ़ें - विशेष जानकारी :-
बेदाग छवि की किरण बेदी पर भी हैं कई दाग पति से अलग रहने लगीं किरण बेदी


