रविवार, 8 दिसंबर 2013

पुलिस को पांच घंटे बाद पता लगा था !


आदत के मुताबिक़ पुलिस  को इस घटना कि भी जानकारी नहीं थी !
अक्सर क्या लगभग सभी मामलों में पुलिस जब रिपोर्ट लिखती है तब यह जरुर लिखती है कि सूचना में जो भी देरी है वह वादी की ओर से है और यही तकिया कलाम पुलिस ने विश्व भर में हलचल मचा देने वाले अयोध्या के दिसंबर १९९२ काण्ड में भी किया !
अमर उजाला आगरा आठ दिसंबर प्रथम पृष्ठ 
छह दिसंबर को अयोध्या का वह ढांचा ध्वस्त हो जाने के बाद पसरा सन्नाटा बड़ा भयावह सा था ,पतली गलियों में जहाँ दूर-दूर तक  कोई दिखाई नहीं देता था वहीँ सारे देश में न जाने कितने शहरों में कर्फ्यू लग गया था वहीँ अब मुझे भी ऐसा लगने लगा था कि अब मैं भी यहाँ से प्रस्थान करूँ क्योंकि घर से बाहर अब बीस दिन से ज्यादा हो गए थे और अयोध्या में छोटे मोटे होटल चाय कि दुकानें भी बंद हों गयीं थी अघोषित समय के लिए । बड़ी दिकत हो रही थी।   
जो कुछ भी हल चल थी वह बस केवल और केवल उस मलवे के ढेर पर जो मंदिर या मस्जिद के दावों मे अब धुल धसरित हो चुका था, सुरक्षा बालों का आलम भी यह था  उनके जवान भी बेचारे थके हुए से थे क्योंकि जैसा अनुमान था,वैसा कुछ नहीं था न कोई हलचल न कुछ अंदेशा।सब कुछ इतना शांति पूर्ण था कि लगता ही नहीं था कि यह वही जगह है,जहाँ जरा सी भी हलचल पूरे  देश को हिला सकती है और पूरा देश इसी पर निगाह लगाए है। अजीब सा सन्नाटा था मगर भयावह नहीं न ख़ुशी न गम यहाँ तक अयोध्या वासियों के मन में भी कोई डर  जैसा नहीं था। दिल्ली और लखनऊ से जब किसी हेलीकाप्टर का शोर सुनाई देता था उसकी आवाज़ समूचे कसबे के सन्नाटे को तोड़ती थी और यह आवाज़ हमार लिए भी एक संकेत थी अब कोई और खबर मिलेगी कोई वीआईपी आया होता था दस मिनट में हम  वहीं पहुंच जाते ,बस अफसर भी कुछ देखते और हैम भी देखते ,कोई कुछ बोलता नहीं था ,मगर मंदिर में हाथ जोड़ कर प्रणाम सब करते थे। बड़े चुपके से और खुद को छिपाते हुए,कहीं फोटो न खींच लिया जाए । 

अमर उजाला मेरठ में आठ दिसंबर को प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित