बुधवार, 11 दिसंबर 2013

बाबर के वंशजों का हक़ दिल्ली की गद्दी पर है, वही दीजिये!

अमरउजाला बरेली ,१२  दिसंबर १९९२ 
छह दिसंबर 1992  को अयोध्या में ढांचा गिराए जाने के बाद अयोध्या की ठहरी हुई ज़िन्दगी ने तो रफ़्तार नहीं पकड़ी मगर तम्बू के बने श्री रामलला के मंदिर में सुबह शाम आरती पूजा निर्बाध और सुचारु रूप से होती रहे अब यह जिम्मेदारी  सरकार की थी,अघोषित रूप से। समय से आयें और मंदिर में पूजा करें ,सुरक्षा बल और अफसर इसकी चिंता करते थे।
इस दौरान ढांचा गिराए जाने को लेकर जितना आक्रोश पूर्ण उत्साह छह दिसंबर तक था उत्साह और उससे सभी नेता हतप्रभ से थे,और उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐसा वाकई में हो जायेगा। सभी नेता और साधू संत अपने अपने हिसाब से तर्क दे रहे थे ,जो कम दिलचस्प नहीं थे। बड़े नेता तो गायब थे मागे जो थे वह सब भेष बदलकर घूम रहे थे ,कोई सूट बूट में था तो कोई जीन्स में और कोई तो इस्लामी टोपी तक लगाए हुए था। देखिये किस किस ने क्या क्या कहा :-
महंत रामचन्द्र दास परमहंस 
अगर वाकई भारत के  मुसलमान बाबर के प्रति आस्था रखते हैं तो वह मक्का मदीना की तरह अफगानिस्तान क्यों नहीं जाते?वहाँ तो बाबर का मकबरा है! मैं मुसलमानो के विरुद्ध नहीं हूँ मेरे कई मुस्लमान अच्छे  मित्र हैं,मैं उनका सम्मान करता हूँ और वह मेरा सम्मान करते हैं मगर तुष्टिकरण और वह भी हिन्दू समाज के अपमान व शोषण पर आधारित, मुझे पसंद नहीं है। अगर बाबर के वंशजों को कुछ देना है तो वही दीजिये ,जो उनकी विरासत है। बाबर कोई धार्मिक नेता ,पैगम्बर या मौलवी नहीं था ,उसके वंशजों का हक़ दिल्ली की गद्दी पर है, वही दीजिये! 
यहाँ यह बताना जरूरी है कि इस मुद्दे से सम्बंधित मुक़दमे की पैरवी के लिए महंत रामचंद्रदास और वादी मौलाना एक ही कर में  मुक़दमे की तारिख पर लखनऊ जाते थे और और साथ ही लौटते थे। 

उर्मिला जामदार -विहिप की तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष् --

यह सब रामजी का चमत्कार है उन्ही के चमत्कार से मंदिर बनेगा। आपने देखा नहीं कि कैसे यह वर्षों का कलक ध्वस्त हो गया। हमने  तो यह सोचा भी नहीं था। जैसे ढांचा गिरा वैसे ही मंदिर भी बनेगा।   

तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. पी वी नरसिम्ह राव ने उसी दौरान घोषणा कर दी कि अयोध्या में मस्जिद फिर से बनवायी जायेगी,उनके इस ऐलान का खूब  मज़ाक उड़ाया गया (पढ़ें अखबार कि खबर)