गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

साहित्य अकादमी -अब ये पुरस्कार किस मतलब के थे !

साहित्य अकादेमी :-पुरस्कार  की राजनीति कहीं इस पर कब्जे की कोशिश तो नहीं !
साहित्य कला और संगीत ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें श्रेष्ठता का कोई सूत्र या गणित नहीं है जिसके जरिये यह तय किया जा सके कि यही अंतिम और श्रेष्ठ था ! इसका मतलब यह भी नहीं है इसके बाद जो होगा ,वह इससे श्रेष्ठ नहीं होगा ! यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जब भी इन पुरस्कारों का चयन हुआ है तो एक शर्त के साथ "निर्णायक मण्डल का निर्णय अंतिम होगा ,जिसे किसी भी अदालत मे चुनौती नहीं दी जा सकती " ।
इस चुनौती को स्वीकार करके पुरस्कृत हो जाने का मतलब सरकार के आगे समर्पण और समझौते के अलावा कुछ और नहीं है ,और इसे स्वीकार करने वाले आज विरोध के घड़ियाली तरीके से कुछ भी कहें,- तो उसका मतलब बेहद मक्कारी भरा तरीका इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि कोई अपना पुरस्कार ही लौटाए ,जिसका मूल्य उसने अपनी प्रतिष्ठा के रूप मे कई सालों मे वसूल लिया है।यह कहना सर्वथा उचित है एक पुरस्कार का मतलब समाज मे कुछ दिन का ही तो सम्मान होता है !,इससे ज्यादा और कुछ नहीं ! अगर इन पुरस्कारों के साथ जीवन भर के लिए आज भी सरकार पेंशन की घोषणा कर दे, तो सबके सब अपने लौटाए गए पुरस्कार वापस मांगने की कतार मे लगे नजर आएंगे ।
ज फिर एक अपील आई है ,जिनहोने पुरस्कार वापस नहीं किया है, वह भी करें ! लगता ही नहीं यह अपील करने वाले कोई बड़े समझदार और धीर गंभीर लोग होंगे ,जो अपनी बात को कहने का कोई ऐसा तरीका जरूर जानते होंगे, जिसे भेड़चाल या अविवेक
पूर्ण न कहा जाये । मगर ऐसा हुआ नहीं । आखिर साहित्यकार लेखक ही क्यों राजनीतिकपदों पर बैठे साहित्यकार भी अपने पदों से इस्तीफा दें ! केन्द्रीय ही नहीं राज्य स्तर पर भी ! साहित्य मे भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय का भेद किया जा सकता है ?यदि हाँ तो यह अँग्रेजी शासन की गुलामी के दौर की एक बहत बड़ी संस्कृति अभी इस देश मे जीवित है । देश मे होने वाली घटनाओं पर किसी का नियंत्रण नहीं है । सरकार के प्रति विरोध जताने के लिए एक से एक आसान तरीके हैं ,मगर हम कब किसका विरोध करेंगे यह अपनी सुविधा और स्वार्थों से तय करेंगे ,इसमें साहित्यकार पत्रकार सबसे आगे हैं ।
देश मे साहित्यकारों के साथ किसी भी वर्ग के सम्मान के लिए बनाई गयी पूरी तरह से स्वायत्त संस्था ,जिसका नियंत्रण भी साहित्यकारों के हाथ मे होता है ,आज इसके अस्तित्व पर बड़ा सवाल है । इस सवाल का जावाब आज नहीं तो कल देश कि सरकार के साथ उन सब को देना और खोजना होगा जो कलम को लोकतन्त्र की रक्षा और सत्ता पर नियंत्रण के लिए एकमहत्वपूर्ण और मजबू हथियार मानते हैं। कलम की ताकत को समझते और समझाते हैं और येन केन प्रकारेण देश और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हैं !
ब ये नयी बहस का विषय है है कि देश मे राजनीतिक कारणों से या अस्थिरतावादी ताकतोंके द्वारा समय समय पर की जाने वाली घटनाओं और जैसी कोई भी घटना हो जाने पर देश के साहित्यकारों की प्रतिकृया समान क्यों नहीं होती । इसमें दो राय नहीं है साहित्यकारों से देश कोई उम्मीद नहीं करता ,लिखना पढ्न उनका शौक है पेशा है ,उनकी रोजीरोटी है ,मगर ये सत्ता पर नियंत्रण का भी एक माध्यम है यह कैसे माना जा सकता है ?सत्ता पर नियंत्रण केवल और केवल वोट की ताकत से ही हो सकता है ,लिहाजा पढे लिखे लोग यदि खुद को दिये गए सम्मान को अपनी ताकत और सत्ता पर कब्जे का एक हथियार बनाएँ ,तो इससे ज्यादा बचकानी और शर्मनाक हरकत क्या हो सकती है । देश सदियों से तरह तरह से हिंसासम्मानित करने वाली संस्थाओं के मुखिया के हाथों भी हमे सम्मान प्राप्त करने मे कोई शर्म नहीं आती । 
हाँ यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि खासकर साहित्य अकादमी से पुरस्कृत वर्ग की वर्तमान भाजपा सरकार मे किसी तरह की पैंठ है ही नहीं, इसलिए  कि इन सारे लोगों को जीवन मे इस बात का भान भी नहीं था कि कभी ऐसा बी होसकता है !किसी भी घटना और सरकार के फैसले का विरोध करना केवल उन लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं है,जो सरकार से किसी भी तरह से उपकृत हुये हैं ,यह बात समझने और समझाने के लिए किसी विशेष सिद्धान्त या विचार धारा की जरूरत नहीं है । और विद्वान ,चिंतक और देश के शुभचिंतक केवल वही नहीं हैं जो सरकार के जरिये उपकारित हुये है । देश के प्रत्येक नागरिक की इस देश के प्रति समान जिम्मेदारी है ,हाँ यह जरूर माना जा सका है जो लोग देश की जनता की ओर से सरकार द्वारा सम्मानित  किए गए, वह खुद की ज़िम्मेदारी कुछ ज्यादा समझ लें ,अगर इसका मतलब यह के नियंत्रक की हैसियत तक खुद को गलत फहमी मे ले जाएँ । आखिर ये पुरस्कार एक समानातर सरकार या संसद का गठन नहीं करते हैं ।
समें दो राय नहीं है कि समाज के प्रत्येक वर्ग को देश के प्रति अपनी चिंता और ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए ,मगर इस भाव को प्रदर्शित करने के लिए विरोध के सैकड़ों लोकतान्त्रिक तरीके हैं ,जिनके जरिये अब तक लाखों लोगों ने सरकारों को झुकाया है । अपनी बात को मनवाया है । देश ने भी देखा कि किसी मुद्दे पर किसी वर्ग ने आंदोलन किया और लाखों करोड़ों लोगों ओ न्याय मिला । साहित्य अकादमी और पद्म पुरस्कारों की अहमियत के साथ खिलवाड़ करने का बेहूदा नाटक आज की पीढ़ी को यह सोचने के लिए मजबूर करता है आखिर इन पुरस्कारों का मकसद क्या है ?क्यों दिये जाते हैं ?किसे दिये जाते हैं ?इनके चयन का नियम कानून भी कुछ है या नहीं ?या अब तक ये केवल ज़ोर जुगाड़ और चमचागीरी के जरिए हासिल होते रहे ?
कादमी और अब पद्मश्री भी निकालने शुरू हो गए हैं । इसमें अब कोई शक नहीं है कि ये पुरस्कार किसी को अपने काम के बल पर नहीं मिले थे ,काम पर मिले होते तो सीने से लगाकर रखते ! इन लोगों ने इन पुरस्कारों को ही सम्मान नहीं दिया और न खुद को सम्मानित महसूस किया !गज़ब की गलतफहमी है -पुरस्कार वापस करके किसका विरोध और किसे विरोध जता रहे हैं?--देने वालों का या अपने अपने काम का?या खुद की पात्रता न होने की स्वीकारोकति है ये !इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसका मौजूदा सरकार से कोई लेना देना नहीं है । होता तो ये -पहले वहाँ तो जाते, जहां के नाम पर छाती पीट रहे हैं !शर्म आती है देश इन्हें बुद्धिजीवी मान रहा था !फाइव स्टार होटलों का बिल कौन देगा जो पूरे खानदान को लेकर मौज की गयी थी जब पुरस्कार लेने गए थे ! वह देश का पैसा था ।
पिछले कम से कम 25 वर्षों मे साहित्य अकादमी और ज्ञान पीठ पुरस्कारों के चयन कर्ता और पुरस्कारों के लिए चयनित मूर्धन्य इसके पात्र भी थे या नहीं ?चयन निर्धारित मानदंडों के आधार पर हुआ ? चयन होने के बाद अचानक कब कब किसके पक्ष मे फैसला बदला गया ?और इन पुरस्कारों के पात्रों के चयन मे सरकारों की क्या भूमिका रही और इन सब का सरकारॉन से क्या संबंध रहा ,ये सब अब सीबीआई की जांच का विषय है !
एक और बात !इनके आगे संकट यह है कि इनहें भाजपा और नरेन्द्र मोदी कैसे पहचानें कुछ तो करें ? ले देकर एक यही तो पुरस्कार है।कसम खाएं अब बाकी जीवन में कोई सम्मान सरकार से नही लेगे।सरकार ,देश की होती है किसी के घर की बांदी नहीं । इनका मकसद मोदी हैं मुद्दा नहीं ।समझ मे नहीं आ रहा है है देश की राजनीतिक गतिविधियों से साहित्य अकादमी का क्या लेना देना ?
साहित्य अकादमी पुरस्कारों की वापसी से यह साबित हो गया है कि यह पुरस्कार ऐसे लोगों को दिये गए थे जो एक वर्ग, जाति ,क्षेत्र और संप्रदाय के ही समर्थक थे और यही नहीं एक वर्ग के बार खिलाफ भी ! और उस समय की सरकार के प्रचंड समर्थक ! अब यह समझ मे नहीं आया कि इस पुरस्कारों का सरकार से क्या लेना देना !इन पुरस्कारों का चयन मे सरकार का कोई नुमाइंदा नहीं होता (लौटाने वालों को वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल मे कोई पुरस्कार नहीं मिला है ) । इसके चयनकर्ता साहित्यकार ही होते हैं ,सरकार केवल पैसा देती है । अब इन्हें लौटाने से यह साबित होता है कि यह पुरस्कार उन्हीं लोगों को दिये गए जो उस समय की सरकार के प्रचंड समर्थका थे !और चयन कर्ता भी सरकारी !
-आशीष अग्रवाल