रविवार, 26 जनवरी 2014

गिडगिडाते लोकतंत्र में ' केजरीवाद ' का उदय हुआ है यह !

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रविन्द केजरीवाल के उदय ने भारतीय राजनीति की दिशा और सोच तो बदल ही दी है,यह अलग बात है कि वह आधे-अधूरे अधिकारों और इच्छाशक्ति  वाली अपनी सरकार को कैसे चलाते हैं और कब तक चलाते हैं। इसमें दो राय नहीं कि आज़ादी के बाद से देश पर शासन कर रही कांग्रेस और इस बीच में जनता पार्टी और बीच में एन डी ए की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने काफी हद तक विकास की सोच और तौर तरीके बदले, मगर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पार्टी की सोच जहां एक तरफ अपने विचारों पर आधारित थी वहीँ उसी पार्टी के सरकार के  मंत्रियों की सोच संसद और मंत्रालयों में काफी हद तक
कांग्रेस के तौर तरीकों से प्रभावित थी,यही वजह रही कि सरकार के पांच साल पूरे  होने के बाद अगले चुनाव में एनडीए और उसके घटक दलों को मुह की खानी पड़ी। यही नहीं इसके बाद हुए फिर एक चुनाव में कमोबेश यही स्थिति रही और हार कर पार्टी  को जब अपने सिद्धांत और विचारों में कमी नज़र आयी तो उसने एक दम नए अंदाज़ में फिर से अपना पूरा चोला ही बदल कर बजाय पार्टी को आगे करने के देश भर में अपनी एक चमत्कारिक छवि बना चुके गुजरात के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी को आगे करके अपने पक्ष में जो माहौल बनाने की कोशिश की है उसके पहले दौर के परिणाम तो उसके लिए उत्साहित करने वाले हैं मगर जिन मोर्चों पर पार्टी को शिकस्त खानी पड़ी,वह अब भी वैसे के वैसे ही हैं,और यहीं पर पार्टी का आगे का भविष्य टिका है। पार्टी के आम नेताओं के मुह से अकसर यही सुना जाता है कि सरकार सरकार बदले बदले से नज़र  आते हैं !
ह सच है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव  कांग्रेस से ज्यादा अहम् है। कांग्रेस अगर इस चुनाव में चरों खाने चित दिखायी देती है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उसके खिलाफ देश में जनमत तैयार है। इसमें भी अब दो राय नहीं है कि कांग्रेस कितना भी जोर लगा ले उसके पक्ष में माहौल बन पाना एक चमत्कार जैसा ही है ,मगर इसका मतलब यह कतई  नहीं हो सकता कि भारतीय जनता पार्टी के लिए मैदान एक दम साफ़ है। यह एक ऐसा कड़वा सच है कि जिसको सुनना ख़राब लग  सकता है मगर स्वीकार  करना कड़वा निगलने जैसा है -आँख बंद करके ! बीजेपी आज अगर केजरीवाल की आलोचना कर रही है या उसे अब केजरीवाल कांग्रेस के बाद शत्रु नंबर दो दिखायी देते हैं तो इसकी वजह उसका अपने  भीतर की  उस घबराहट  है जो असन्तुष्टो को केजरीवाल के घर का रास्ता दिखाती है,मगर पार्टी को बजाये केजरीवाल के अपने घर को ठीक करना चाहिए। क्यूंकि उसकी सफलता और असफलता इसी बिंदु पर है। मोदी की स्वीकारोक्ति ,आम जन मानस और पार्टी का अंतर्विरोध अलग अलग बातें है। मोदी को स्वीकार करने वाले वो भी है जो पार्टी उम्मीदवार से खफा हैं और उसके खिलाफ काम  करने का ताना-बाना बुन चुके हैं। और अब उसमे आखिरी गांठे लगा रहे हैं। बीजेपी को पहले भी जो नुक्सान हुआ है वह अपनों से ज्यादा हुआ है।  विरोधी दलों से कम। दिल्ली का ताज़ा चुनाव और इससे पूर्व उत्तराखंड के चुनाव इसकी ताज़ा मिसाल हैं। जहां पार्टी मात्र कुछ ही सीटों से पिछड़ गयी।
भारतीय राजनीति में केजरीवाल के उदय के लिए जिस हद तक कांग्रेस दोषी है, भारतीय जनता पार्टी इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती ,आखिर केंद्र से लेकर तमाम राज्यों में उसकी सरकारें रहीं हैं और हैं। सिर्फ यह मान कर भजपा अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि केजरीवाल केवल दिल्ली तक सीमित हैं। भाजपा और देश के सभी राजनितिक दलों को आज यह सच स्वीकार करना पडेगा कि केजरीववाल आज एक व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि एक विचार धारा का नाम है, जो कांग्रेस समेत सभी राजनितिक दलों की उस कार्यप्रणाली से उपजी है जो कांग्रेस से हजार मतभेद होने के बावजूद सभी दलों ने कमोबेश सरकार के तौर तरीकों और गोपनीयता के नाम पर जो कांग्रेस की परम्परा  थी और है,उसे न केवल अपनाया बल्कि उसको बदलने की सोची तक नहीं। दिल्ली में सरकार बनाने के करीब सीटें ले आने के  पहले तक किसी भी दल और व्यक्ति  ने केजरीवाल का विरोध इसीलिए नहीं किया कि उनका मुद्दा गलत नहीं था। इसके साथ यह भी सही है किसी भी दल को चाहे भाजपा हो कांग्रेस, यह अंदाज़ा भी नहीं था कि केजरीवाल का ऊंट चुनाव में किस करवट बैठेगा ,बस चुनाव के बाद कांग्रेस का समर्थन लेना ही एक ऐसा मुद्दा बन गया, जिसको लेकर केजरीवाल का विरोध किया जा सकता है। हिन्दुस्तान के एक भी ज्योतिषी ने इसकी भविष्य वाणी तक नहीं की थी की केजरीवाल कहाँ जाकर टिकेंगे।
भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदले जाने की आवयश्कता के दौर में आज केजरीवाद का उदय हुआ है, जो  कहीं से भी राजनीति में अराजकता और सरकार में भ्रष्टाचार के समर्थन में  नहीं है। इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता। केजरीवाल अभी नए हैं सरकार और राजनीति  के लिए। उनके काम और सोच में कमी होना बड़ी बात नहीं है। उनके पास अनुभव नौकरी का है और जज़बा शासन करने का नहीं। इसका मतलब यह कैसे हो सकता है कि उनकी उस नियत में बदलाव आ गया है,जिसको लेकर उन्हें जनसमर्थन मिला और आज वह देश पर राज करने की अपनी बारी का इंतज़ार करने वाले मंसूबों के लिए नयी चुनौती बन गए है ?यह भी कम महत्व पूर्ण नहीं है की उन्होंने उस वंशवाद की राजनीति को खुली चुनती देते हुए अपनी आवाज़ बुलंद की, जो आपातकाल से लेकर आजतक गैर कांग्रेसी दलों का एक प्रमुख मुद्दा है। उनका सीधा संघर्ष तो कांग्रेस के खिलाफ ही शुरू हुआ और बहुत कम समय में ही एक क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत हुई। नौकरशाही का रवैया तो पहले ही स्पष्ट है मगर देश को सुधारने का दम भरने वाले केवल राजनीतिक चश्मे से ही देख रहे हैं। नरेंद्र मोदी यदि देश के प्रधानमंत्री बन भी गए तो शासन बदलेगा,सोच और व्यवस्था नहीं। किसी सांसद या जनप्रतिनिधि की हैसियत या अधिकारों में कोई इजाफा नहीं होने वाला। मैंने मंत्रियों और सांसदों और विधयाकों को अफसरों और मंत्रियों और मुख्यमन्त्रियों के आगे गिडगिडाते देखा है। उनकी लाचारी और बेबसी पर चुप्पी देखी है।
 आधी सदी से ज्यादा के बिगड़े हुए तंत्र पर शासन करते हुए भी जो लोग उसमे खामियों की बात छोड़िये उसमे पैदा हो रही दमघोटूं सड़न को तक नहीं रोक पा रहे थे, आज केजरीवाद के पीछे की सोच से उनकी भी नाइत्तफाकी नहीं है। बस इतनी सी तो बात है कि केजरीवाल ने जिस कांग्रेस के खिलाफ आवाज़ उठायी उसी के समर्थन से उन्होंने साकार बना ली। मगर वह सरकार जैसे दिखने के लियए बेताब नहीं हैं ,और भले  ही समर्थन लेने के पीछे हुयी आलोचना में यह तर्क दिया गया कि वह सरकार बनाने के लिए लालयित थे ,इसीलिये उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली। कंग्रेस हो या भाजपा या किसी राज्य में राज कर रहे क्षेत्रीय दल उनकी केंद्र सरकार के आगे लाचारी और केंद्र में प्रधानमन्त्री के आगे केंद्रीय मंत्रियों की लाचारी और राज्यों में मुख्यमंत्री के आगे मंत्रियों की लाचारी और बौनापन किसी भी बड़े से बड़े और लोकप्रिय जननेता से सुना जा सकता है। इस हालत के आगे स्थानीय निकायों और ग्राम स्तर की इकाइयों की तो बात ही करना बेकार है। फिर नौकरशाही  के आगे सरकार की बेबसी का दर्द कोई इसलिए बयान नहीं करता क्योकि जिस झूठी शान के बूते पर राज किया जा रहा है वह भी नहीं बचेगी। राष्ट्र हित  गोपनीयता संविधान और दलीय निष्ठा के आगे लाचार लोकतंत्र हमेशा गिडगिडाता ही रहा है।
खिर केजरीवाल की सोच और नियत को भांपकर कांग्रेस और भाजपा ने अपनी रणनीति और तौर तरीकों में बदलाव तो किया ही है। इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आमआदमी की पीड़ा से केवल राजनीतिक दल के अलावा  बाकि नागरिक ही प्रभावित होते हैं?पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता आखिर उन सारी  परेशानियों से बाबस्ता रहते हैं जिसके खिलाफ केजरीवाद का उदय हुआ है। केजरीवाद ने  एक हौसला तो पैदा किया ही है, जो कुछ नहीं कर सकता तो इतना तो करेगा ही कि जिन विषयों पर बड़े से बड़ा नेता मंत्री तक बोलने से कतराता था आज उसके भीतर एक हौसला पैदा हुआ है और निश्चित तौर पर उम्मीद बनी है कि अब कम से कम वह सब होना मुश्किल होगा जो संविधान के नाम पर आम आदमी से लेकर सबको बेजुबान बनाता था।  
मौजूदा पेड़ न्यूज़ के दौर में अब जमीनी हकीकत से सभी दूर हैं। कार्पोरेट दौर है।  मीडिया भी और पार्टियां भे कार्पोरेट। जैसे मीडिया के लोगों ने समझोते करके दिहाड़ी मजदूर से भी बदतर हालत में काम करना स्वीकार किया है, वैसे ही राजनीतिक दलों में भी अब यह प्रवृत्ति गहरे तक घुस गयी है। यही प्रवृत्ति जहाँ मीडिया को किसी भी हद गिराने में कामयाब हुई है, वहीँ अब इसका दूसरा शिकार देश के राजनीतिक दल होने जा रहे हैं जहां अभी से अमरीका और जापान के लोग उनके अभियानों का संचालन करने जा रहे हैं। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति किस कदर घातक होने वाली है जिसका अंदाज़ लगना मुश्किल है ,इसके खिलाफ बोलना या अपनी राय  देना और भी घातक। यह बात अभी से ही राजनीतिक दलों के भीतर बहुत बड़ा मुद्दा है, मगर इस पर मुह खोलने का विचार भी आत्मघाती है,यह सोच आने वाले कल के लिए जूझने के आत्मबल को अभी से कमजोर कर रही है।
समें दो राय नहीं कि अरविन्द केजरीवाल के पास सरकार तो बड़ी बात ,है राजनीतिक व्यवहार का तज़ुर्बा नाम की चीज नहीं है। हो भी नहीं सकती। मगर उनके पास एक विचार तो है और ऐसा विचार कि जिसने सभी को  अपनी सोच बदलने  के लिए न केवल मजबूर कर दिया बल्कि हताश और निराश समाज में एक हौसला पैदा करने वाला काम किया है।  केजरीवाल की सोच से किस-किस के समीकरण बिगड़ गए और किसी के लिए सत्ता का रास्ता कितना मुश्किल हो गया हो  मगर इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए कि केजरीवाल ने कांग्रेस हो या बीजेपी ,उनके असंतुष्टों के लिए एक नया रास्ता तैयार कर दिया है। नया घर तैयार कर दिया है और एक घबराहट भी,क्योंकि अब सबको अपनों के खिलाफ सोचते और कुछ करते समय डूबते जहाज़ कांग्रेस से जितनी बेफिक्री थी अब उतनी ही बड़ी तस्वीर उन्हें "आप " दिखायी तो देती ही है।
शय भीतर घात से है और वो अभी भी इस कदर बनी हुयी है, इसका सबस बड़ा नुक्सान केवल और केवल भाजपा को ही होना है। दिलों की दूरियां अभी उतनी ही गहरीं है जितनी थीं। उन्हें पाटने का प्रायस सिर्फ मोदी की आँधी से ही हो रहा है,मगर हकीकत में यह आंधी दिलों को दूर करेगी ,दूरियों को नहीं। कांग्रेस से ज्यादा यह हालत आज भाजपा में है। अगले लोकसभा चुनाव की तस्वीर चाहे कैसी भी हो मगर उसकी झलक अभी से दिखा दिखा कर जनमानस में दिलों दिमाग में बिठाने कि कोशिश  की जा रही है। इस कोशिश  में खुद की तस्वीर में पड़े दाग और गहरे हो रहे हैं ,जो उभरे हुए होने के बावजूद मिटाने की कोशिश नहीं की जा रही है।
ब कुछ बदला हुआ है। पहले जहां मीडिया से एक खतरा होता था कि कभी  सच लिखेगा और हकीकत सामने आएगी। मुद्दे उठेंगे और बहस होगी फिर जनमत आएगा। मगर अब ऐसा कुछ नहीं है। पेड़ मीडिया के दौर में आज मीडिया कि स्थिति उस भांड जैसी है जो किसी के भी दरवाज़े पर नाच गाकर आने में दो मिनट नहीं सोचने वाला और  इस मीडिया को यह भी शर्म लिहाज़ नहीं बची है कि उसने कल क्या छापा था। और अगले दिन ठीक उसके उलट कुछ भी छाप  देने या दिखा देने से उसकी खुद की विश्वसनीयता कितनी बचेगी या खतम हो गयी है?यानि अपत्यक्ष रूप से मीडिया यह मान चुका है कि अब उसे अपनी विश्वसनीयता की परवाह नहीं करनी है -शायद इसी विचार को आत्मसात करके मीडिया में पेड़ न्यूज़ का दौर अभी से चल पड़ा है। काले अक्षरों में बीके हुए जमीर साफ़ पढ़े जा रहें हैं।
खबारों ने अभी से सौदे कर लिए हैं। सम्भावित उम्मीदवार या मौजूदा सांसद टिकट की आस में बेधड़क छप रहे हैं। अखबारों का हकीकत से वास्ता नाता ख़त्म हो गया है। उन्हें सिर्फ किसी के पक्ष में छापना है। इस हद तक छापना है कि पेड़ न्यूज  के लिए पैसे देने वाला चाहिए तो उसके विरोधी की बात नहीं छपेगी। एक तरफ़ा राज। एक ही बात। अब इस पर कोई क्यों एतराज़ करे और करे भी तो किससे ?केजरीवाल ने इस मोर्चे पर भी काम शुरू करके भारत में मीडिया को भी कठघरे में खड़ा किया जो एक ऐसा कदम है जिसकी आलोचना उनके विरोधी भी नहीं करेंगे। बरसों से इस देश में मीडिया को मैनेज करके नीतियों सिद्धांतों और कानून की बली चढ़ाई जा रही है।
कनीकी विकास के दौर में जहां मीडिया का जबर्दस्त विकास हुआ वहीँ "मीडिया आज एक बिकाऊ माल की तरह बाज़ार में  है जो किसी भी दाम पर बिकने को तैयार है। मीडिया घरानों के सौदे हो हो रहे हैं ,हो चुके हैं राजधानियों से लेकर गली मुहल्लों तक। ऐसे में अगर केजरीवाल इसके खिलाफ भी आवाज़ उठा रहें हैं और आम जन को कम से कम इतना तो हौसला दे रहे हैं कि देश से बड़ा कोई नहीं है।" किसी को आम आदमी और देश को गिरवीं रख लेने का अधिकार नहीं है ,अब इस हौसले को किस हद तक कुचला जायेगा और कितना बल दिया जायेगा यह हमारे नीति नियामकों की नियत पर निर्भर है। आज के दौर में अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता का मतलब वही है जो संविधान में कल्पना की गयी थी या नहीं इस पर फिर से सोचने का वक्त आ गया है ,अरविंद केजरीवाल की बात को ऐसे ही हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। बाक़ी तो  'समरथ को नहीं दोष गुसाईं!'

-आशीष अग्रवाल 

लुधियाना से श्री प्रदीप ठाकुर ने बेबाक प्रतिक्रया दी है ,
जो मुझे तीन फरवरी को ईमेल से मिली है- प्रस्तुत है 

बहुत खूब! जबरदस्त विश्लेषण!! सटीक आकलन!!! 

बस यूं ही भड़ास पर चला गया था, और इस शीर्षक पर नजर चली गई.आलेख थोडा लंबा जरूर था, लेकिन उबाऊ कतई नहीं. विषय की व्यापकता को समझाने के लिए इतना लंबा जाना तो लाजमी था. बड़े दिनों बाद फालतू पढने में खर्च हुए समय का अफ़सोस नहीं हुआ; बल्कि यह लगा कि पाठक बने रहना जरूरी है, और फालतू समय खर्च करना भी जरूरी है.खैर,

 मैं आशीष अग्रवाल का भूत-वर्तमान नहीं जानता, बस केजरी'काल' शीर्षक देख जिज्ञासा हुई थी, और पढता चला गया. बर्ना तथाकथिक दिग्गजों के लेखों के आर-पार जाने के लिए पढने की जरूरत ही कहां पड़ती है.आप का आलेख पढ़कर यह भी लगा कि एक बार फिर से भारत बदलने जा रहा है, और आने वाले युग को केजरी काल ही कहना पड़ेगा. समाज बदलेगा तो सत्ता की चूलें हिलेंगी, बाजार भी बदलेगा और उसके पीछे-पीछे समाचार (बाजार) पत्र/चैनलों को भी बदलना पड़ेगा. 

हां, यह अफ़सोस जरूर है कि जब देश व समाज के एक बड़े तबके को पारंपरिक मीडिया के मार्गदर्शन की सबसे जरूरत थी, वह इस बड़ी जिम्मेवारी को संभाल पाने के काबिल नहीं रहा है. खैर, वैकल्पिक मीडिया तो है! किसी अख़बार या चैनल ने मुझे आप तक नहीं पहुंचाया. मै यह भी कह सकता हूँ कि मेरी आकुलता ने ही मुझे आपके विचार पढने को उकसाया, और मैंने उस पर प्रतिक्रिया जताना भी इसलिए जरूरी समझा कि पता नहीं कितने आशीष अग्रवाल कितने माध्यमों से कहां-कहां पहुंच पा रहा है.

जी आशीष जी

 देश बदल रहा, मगर चुपके-चुपके.
मेरा परिचय लेना भी जरूरी नहीं...
मैं भी आम जनता का ही हिस्सा हूं...
अब तो आम जनता होना भी खेमेबाजी के दायरे में आता जा रहा है. बस इसी से घबराता हूँ! लेकिन कब तक?

आपके लेख की तरह मेरी प्रतिक्रिया भी लंबी हो गई.बहुत बहुत साधुवाद! 

प्रदीप ठाकुर






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