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| पद्मश्री श्री लीला धर जगूड़ी |
साहित्य अकादमी पुरस्कारों की रेलमपेल के दौरान अभी कुछ दिन पहले मेरे मित्र एवं अग्रज और वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि, पद्मश्री सम्मान से विभूषित श्री लीला धर जगूड़ी जी से से अक्सर कभी न कभी किसी समसामयिक मुद्दे पर चर्चा हो ही जाती है। जगूड़ी जी बेबाक और निर्विवाद साहित्यकार हैं और गद्य और पद्य मे समान रूप से लिखते हैं । समसामयिक मुद्दों पर भी अक्सर अपनी और बेबाक टिप्पणी उन्हें चर्चा मे ला देती है । हाल में हुयी एक चर्चा के दौरान तमाम बातों के अलावा पुरस्कारों की वापसी के मुद्दे पर उन्होंने अपने अपनी बात भी कही ,अपने तरीके से ।सन 1954 में साहित्य अकादमी की स्थापना के समय तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री स्व. पं जवाहर लाल नेहरू ने इसकी उदघाटन के समय यह बात साफ़ कर दी थी इस अकादमी में प्रवेश करने वाला मैं अंतिम व्यक्ति हूँ ,जो राजनीति से जुड़ा है। आज के बाद कोई भी राजीनीतिक व्यक्ति इस साहित्य अकादमी में प्रवेश नहीं करेगा और न ही सरकार का इसमें किसी किस्म का कोई दखल रहेगा। शायद यह बात कितने साहित्यकारों को पता है,यह तो मैं नहीं जानता ,मगर साहित्य अकादमी में किसी राजनीतिक व्यक्ति का कोई दखल न तो अभी तक है और न हो सकता है ,यह बात साफ़ है। वरिष्ठ कवि व साहिय्कार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी जी कहते हैं जब चाहो अपने ही काम का अपमान अपने हाथों कर लो -और तुर्रा यह की सरकार ठीक काम नहीं कर रही है ?ये क्या बात हुयी ?
जगूड़ी जी इस मुद्दे पर काफी नाराज़ हैं ,खासकर इस बात से कि अचानक पुरस्कारों की राजनीति होने लगी ,न केवल पुरस्कार वापस किये जा रहे ,बल्कि बाकी लोगों से भी यह अपेक्षा की जा रही है की वह भी पुरस्कार वापस करें ! वह खिन्न हैं और आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि आखिर हो क्या रहा है ?अकादमी साहित्यकारों,लेखको के लिए एक मंच है,जो उनकी रचनाओं के प्रकशन के साथ साथ समस्त भाषाओं में से बेहतर साहित्य का चयन करके सभी भाषाई साहित्यकारों को प्रोत्साहित करती है और बेहतर रचनाओं,कृतियों को पुरस्कृत करती है। साहित्यकारों और लेखकों का सरकार से दूर तक कोई लेना देना नहीं है ,क्योंकि वह सब रचनाकार हैं ! एक लेखक का सरकार से क्या और कितना सरोकार हो सकता है ,यह समझना कोई बहुत गंभीर प्रश्न नहीं है। उनका तर्क था।
जगूड़ी जी कहते हैं -ये कोई मजाक तो है नहीं -पहले पुरस्कार के लिए रचनाएं भेजी आवेदन किया और अब जब चाहो अपने ही काम का अपमान अपने हाथों कर लो -और तुर्रा यह की सरकार ठीक काम नहीं कर रही है ? सन 1954 में साहित्य अकादमी की स्थापना के समय तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री स्व. पं जवाहर लाल नेहरू ने इसकी उदघाटन के समय यह बात साफ़ कर दी थी इस अकादमी में प्रवेश करने वला मैं अंतिम व्यक्ति हूँ जो राजनीति से जुड़ा है। आज के बाद कोई भी राजीनीतिक व्यक्ति इस साहित्य अकादमी में प्रवेश नहीं करेगा और न ही सरकार का इसमें किसी किस्म का कोई दखल रहेगा। और शायद यह बात कितने साहित्यकारों को पता है यह तो मैं नहीं जानता ,मगर साहित्य अकादमी में किसी राजनीतिक व्यक्ति का कोई दखल न तो अभी तक है और न हो सकता है ,यह बात साफ़ है। इसके साथ ही मात्र तीन दिन पहले निर्णायक मंडल के सदस्य इसका फैसला करते हैं ,इसके पहले किसी को कुछ पता नहीं होता है।
जगूड़ी जी कहते हैं -पुरस्कार वापस करने वालों को यह तो पता होना ही चाहिए कि "साहित्य अकादमी कोई साहित्यकारों का थाना नहीं है ,जो ज़रा सी कोई बात हुयी नहीं और पहुँच गए रपट लिखाने" ! यह एक बेहद गैरजिम्मेदाराना बात है। समाज इन सब बातों की अपेक्षा तो नहीं करता है। इसका भी कोई मतलब नहीं है की किसी एक ने पुरस्कार वापस क्या तो अब बाकी सब भी करें -चाहें मुद्दे से सहमत हों या नहीं। साहितकार का काम सरकार से लड़ना नहीं है ,वह तो अपनी कलम से लड़ता है। रचना समाज का चित्रण भी है और विसंगतियों को भी उकेर देती है ,इसके लिए कलम ही काफी है।
पुरस्कारों की वापसी के लिए एकाएक चले अभियान के पीछे मुदा क्या है -जगूड़ी जी बोले भाई मुझे नहीं पता क्या मुद्दा है बाकी मैं इतना जानता हूँ की कसी भी साहित्यकार को पुरस्कार सरकार की की समाज की निगरानी और रोज बरोज होने वाली घटनाओं पर राजनेताओं की तरह अपनी प्रतिक्रिया नहीं देनी है। हाँ अब अगर किसी को सरकार से ही लड़ना है तो उसके लिए पुरस्कार को माध्यम न बनाया जाये। पुरस्कार सिर्फ रचना की श्रेष्ठता के लिए मिला है। सरकारों पर जोर आजमाइश के लिए नहीं। कोई भी मुदा जो सार्वजनिक हो उसके लिए लोकतंत्र में हजार माध्यम हैं -कहीं भी विरोध दर्ज किया जा सकता है ! रही बात सरकार से लड़ने की ,तो इसका भी तरीका है ,मगर आज कोई ऎसी नयी बात तो नहीं हुयी है ! आखिर क्यों लड़ना है ?किससे लड़ना है। यह तो तय हो ? साहित्यकार लड़ेंगे ? यह भी तय होना चाहिए।
अकादमी पुरस्कारों के बाद पद्म पुरस्कारों की वापसी के लिए अपील की जा रही है ,इसकी चर्चा वह थोड़ा भड़के और बोले यह क्या बात हुयी ? मैंने वापस किया, तुम भी करो ! मिलते समय क्या सबने एक दूसरे की सिफारिश की थी ? अरे भाई जिसे विरोध करना है ,सड़कों पर करो। मैं नहीं समझता कि साहित्यकारों को केवल अपने काम के लिए मिले सम्मान को वापस करके (जो सरकार ने नहीं दिया है ) साहित्यकार या कोई और अपना सरकार से विरोध प्रकट करने के लिए पुरस्कार को माध्यम बनाकर उचित कदम उठा रहे हैं !
-आशीष अग्रवाल
