यह भी कम आश्चर्य जनक नहीं है कि सैकड़ों साल पुऱानी जर्जर इमारत को ध्वस्त करने में राजनितिक रूप से भले ही बीस साल का समय लगा, मगर ढहाने में मात्र ५ घंटे लगे ,हम लोग हम सब लोग सुबह सात बजे से इस ढाँचे के पास थे और वहाँ तक पहुँचने के बाद सब तितर बितर हो गए। साढ़े नौ बाके के बाद सभी पत्रकारों को इसके ठीक सामने बनी इमारत मानसभवन कि छत पर चले जाने को कह दिया गया वहाँ सभी पत्रकारों और टीवी के लिए सुरक्षित स्थान बनाया गया था। ग्यारह बजे के करीब जब गुम्बद पर कुदाल लिए दो युवक दिखाई दिए तो बस भगदड़ मची और सब भागने लगे जिसमे सभी लोग थे यहाँ तक कि वह अधिकारी भी,मेरे साथ खड़े थे #उमेश सिन्हा ,जो अब उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी हैं जिनकी वहाँ ड्यूटी लगी थी अफवाहों के चलते एकदम भागे बाक़ी तो पता नहीं मगर मैं और मेरे साथी पत्रकार ओंकार सिंह खेतों-खेतों होते हुए फैज़ाबाद के पहंच गए और वहाँ से फिर वापस हमें अयोध्या आना था सो फिर मुख्य रास्ते से अयोध्या आये ,अब तक शाम के चार बज गए थे और समाचार भी भेजने थे सोच कि क्यूँ न एक बार उस इमारत कि और देखा जाए कि कि काम कितना हो चुका है? देखा तो सब मैदान था और मलवे के नाम पर मिटटी का ढेर था ईंटें भी नहीं बची थी। पांच घंटे में ही सब मैदान हो गया।
| सात दिसंबर १९९२ बरेली अमर उजाला में प्रकाशित |