शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

दलों का नहीं,दिलों का चुनाव करिये !

प को जापान पसंद आया या अमेरिका ,बस अब इन दोनों के बीच आपको अपनी सरकार बनानी है। इनके तौर तरीके और इनकी सोच अगर आप से मेल नहीं खाती है तो आप ख़ारिज। आपकी सोच  खारिज। आप वक्त के साथ नहीं। देश के साथ होंगे तो यह कोई बड़ी बात नहीं है।
देश में घमासान मचा है। मिशन 2014 ,पहले चुनाव दलों के बीच होता था। जबसे होश सम्हाला, यही देखा। यही सुना। चुनाव से पहले के हालात देखे झेले और चुनाव के  बाद की तस्वीर भी दिल दिमाग में बनी। मगर काफी दिनों से कोई  तस्वीर ही नहीं बन रही है। सोचना पड़ा कि क्या खुद का सोच गलत है या हम बेगाने हैं?या फिर बेगाने होने वालें हैं? आखिर हों क्या रहा है? दलों के बीच चुनाव में मुद्दे होते थे। हमारी आपकी तकलीफों और सुविधाओं का जरूरतों और विषमताओं का एक समुचित अध्ययन होता था, फिर उस पर दल अपनी राय और सोच रखते थे।  उस पर बहस होती थी और उसके बाद जनता को अपना मत प्रकट करने के लिए मतदान करना होता था। और इस तरह सरकार बनती थी। ये सोच आज एक दम बकवास है।

ब दल तो कहीं हैं ही नहीं। दल नहीं तो मुद्दे भी नहीं। मुद्दे नहीं तो हम और आप भी किसी के चिंतन में नहीं हैं। हमें भी और आपको भी ये बताया जा रहा है अपने लिए, अपने बारे में नहीं सोचना है। जिसके बारे में सोचना है, वो देश भी नहीं नही।यह आपको खुद समझना है कि वो जो कह और सोच रहे हैं तो देश  के लिए ही सोच रहे हैं,वह कोई राजनितिक दल भी नहीं है, जिसको जानकर आपको यह चुनाव करना है कि आप किस दल को वोट दें। दल होंगे तो निश्चित तौर पर किसी विचार और व्यवस्था की बात होना लाजिमी है। ऐसा भी नहीं है। इन सबके  बीच मुद्दा और मुद्दे कहीं आते ही नहीं है।

ब दिलों की लड़ाई है। बस आपको किसी को दिल में बसाना है। पहले वो आपको दिल में बसाने की बात करते थे,आपकी तकलीफों का अहसास उन्हें है,ये बताकर ,अब आपको उन्हें दिल में बसाना है। अपनी तकलीफ और जरूरतें भूलनी हैं ,जैसे प्रभु का चिंतन करते समय सब कुछ त्याग देना ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है। ठीक उसी तरह। देश मुद्दा विहीन है। आप भी समस्या विहीन हैं। एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं,दूसरी तरफ केवल और केवल राहुल गांधी। मोदी की रेटिंग अंतर्राष्ट्रीय स्तर काफी ऊँची पर पहुँच गयी है ,यह अभी से तरक्की का बड़ा संकेत हैं। राहुल गांधी इस रेटिंग में काफी नीच खिसक चुके हैं यह उन विदेशी कारोबारियों की सफलता है जिनके लिए भारत एक बाज़ार साबित हो रहा है। मतलब एक अमेरिका की तर्ज़ पर चुनाव अभियान का संचालन कर रहा ही तो दूसरा जापान की तर्ज़ पर। जैसे उनके यहाँ राष्ट्रपति का चुनाव होता है,ठीक उसी तर्ज़ पर उन्होंने हमारे देश में भी अभियान चला दिया। कांग्रेस हो या बीजेपी इनके पास अपने कार्यकर्ताओं की एक लम्बी फ़ौज़ है,अब इनकी भी भूमिका सीमित हो गयी है सब कुछ कार्पोरेट घरानों की तर्ज़ पर।जो ऊपर से निर्देश आये, उसका पालन करिये। कहाँ लोग अपनी जान माल की बाज़ी लगा दिया करते थे ,अब ज़माना बदला हुआ है।

हाईकोर्ट की बेंच है ना यूपी का विभाजन, न किसान की  बात न मज़दूर की,थोड़े समय पहले ही इस देश के युवाओं पर सबकी निगाह लगी थी,अब यह भी एक वोट बैंक जैसा बन गया है। मतलब किसी के लिए कोई नीतिगत बात नहीं ,मुद्दे इतने घटिया की यहाँ लिखने में भी हाथ रुक जाए। मोदी आये तो देश बर्बाद हो जाएगा! और उन्होंने देश बेच दिया ,वह बच्चा है,और कच्चा है,किसी के गाल और किसी की चाल कहीं पर नाच गाना और कहीं ऐसी ही कुछ हलकी और घटिया बातें।

ह कम गम्भीर बात नहीं कि अब अमेरिका और जापान की कम्पनियां हमारे देश में चुनाव अभियान का ठीक वैसे ही संचालन करें जाइए एलजी औए नोकिया औए सैमसंग का कोई सामान बेचना हो।  चीन के लिए हम पहले ही एक अच्छा बाज़ार बन चुके हैं। अब हमारी बुद्धि विवेक और प्रतिभा को भी ठुकरा कर नीति नियामक की भूमिका में अमेरिका और जापान आ रहे हैं ,यह सब क्या संकेत है?आज जो लोग हमारी सोच और संस्कृति को हमसे ज्यादा समझने का दवा करते हुए हमें राह करने के तरीके बताने आ रहे हैं ,कल को हैम उनकी किस बात को मानने से इंकार कर देंगे ,और कैसे वो अपने हिसाब से नीतियाँ   और कानून नहीं बनवा लेंगे ,इसकी क्या गारंटी है? आखिर अपने ही लोगों को समझने और समझाने के लिए हम विदेशी मेधा को खुद से बेहतर क्यों मान बैठ हैं ?यह वक्त की जरूररत है या खुद से आँख चराने वाली बात?पाने लोगों की उपेक्षा करके कैसे हम उन पर राज करने की सोच रहे हैं? एक समय सीमा तक तो वह हमें देखेंगे इसके बाद जब वह जागे तो काफी देर हो जायेगी।