सोमवार, 29 जून 2009

पी.चिदंबरम के नाम

तीस जून को हरिभूमि ,दिल्ली में प्रकाशित
पी चिदंबरम भारत के ऐसे मंत्रियों में गिने जाते हैं,जो कानूनों को बनाने और और उनका सख्ती से पालन कराने में ख़ुद को माहिर समझते हैं काफी समय तक भारत के वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने आयकर कानूनों को इतना सख्त बनाने की कोशिश की कि आम आदमी तो क्या कांग्रेस और उसके खेवनहार भी इस बात से डर गए थे कि यदि चिदंबरम इसी रफ़्तार से चलते रहे तो भारत की जनता भी कहीं कांग्रेस न डर जाए और हल में संपन्न हुए आम चुनावों में कांग्रेस को चलता न कर दे खैर ! समय रहते देश के प्रधान मंत्री सरदार मनमोहन सिंह ने देश की आवोहवा को पहचान के मंत्रिपरिषद में फेर बदल कर लिया और चिदंबरम साहब की वित्त मंत्रालय से विदाई करके ,उनके सख्त मिजाज़ की जहाँ जरूरत थी उनको वहीँ लगा दिया यानी पी चिदंबरम पिछली सरकार में आखिरी दिनों में भरता के गृह मंत्री बना दिए गए देश की सुरक्षा के लिहाज़ से देश को उनके जैसा सख्त मिजाज़ गृह मंत्री ही चाहिए,क्यूंकि आतंकवाद जिस तरह से यहाँ सर उठा रहा है और सरकार को उसके आगे 'घुटने टेकने' जैसी बदनामी झेलनी पड़ रही थी, मगर वक्त की मार देखिये की चिदंबरम के गृह मंत्रालय में आते ही हिंदुस्तान का सबसे बड़ा बम विस्फोट मुंबई के ताज होटल में हुआ
चुनाव सुधार :काफी समय से मेरे मन में एक बात मुझे कचोटती है वोह यह की आखिर भारत के चुनाव प्रणाली को आखिर कैसे ऐसी बने की इस देश के शत-प्रतिशत मतदाताओं की इसमे हिस्सेदारी हो और चुनावों जैसे लोकतंत्र के 'महापर्व' की पवित्रता के प्रति देश के लोगो की ऐसे श्रद्धा हो जैसे की देशभक्ति की भावना उनमे है आखिर देश की सरकारें भी चुनाव सुधारों के प्रति काफी समय से गंभीर हैं और इस मद में अरबों रूपया कह्राच भी कीया जा रहा है, मगर इस साडी कवायद का नतीजा केवल चुनाव में हिस्सेदारी करने वाले उम्मीदवारों की लगाम कसने तक ही रह गया है और हमर चुनाव आयोग एक तरह से राजनितिक दलों का पुलिसवाला बन कर रह गया है उसकी कोशिश पर लगाम कसने की रहती है चुनाव आयोग का मानना है की यदि उम्मीदवारों को डरा लिया गया तो चुनाव में होने वाली धांधलियां रुक सकती हैं और १०-१५ सालों में देश में चुनावकी पवित्रता कायम हो सकेगी मगर ऐसा है नहीहमारे देश कानून बनाने वालों की एक प्रव्रत्ति रही है कि बजाये सुधर के, वह सख्ती पर ही ज़ोर देते हैं भारत के कानूनों में सुधार के कम सख्ती के ज्यादा प्रावधान रहते हैं सख्ती के मामले में चिदंबरम साहब आयकर को लेकर काफी नम कीं चुके हैं और उनकी सख्ती का ऐसा आलम रहा है की आम आदमी और गरीब मध्यमवर्ग का आदमी उनकी सरकारी खजाना भर देने की आदत से वैसे ही चुका था की जैसे आतंकवाद से डरा हुआ हो आज चुनाव सुधारों का दौर है और भारत कि जनता भी चाहती है कि देश में आम चुनावों के जरिये ऐसे सरकार चुनकर आए जो देश और जनता के प्रति संवेदनशील हो आज हालत यह है कि किसी राज्य में भी अगर किसी दुसरे दल कि सरकार आती हो तो वह सबसे पहले अपने लिए ऐसे बंदोबस्त करना चाहती है जैसे मायावती उत्तर प्रदेश में कर रही हैं २४०० करोड़ रूपया मात्र पत्थर लगाने में ही खर्च किए जा रहे हैं इन सब पैर किसी कि लगाम ही नही है
पी चिदंबरम साहब अपनी सख्ती के लिए जाने जाते हैं आज देश को उनकी जरूरत है देश कि चुनाव प्रक्रिया में इतना तो फर्क आया है कि अब मतदान कई charanon में होने लगा है

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