शनिवार, 4 जुलाई 2009
कुछ और क़ानून भी बना ले कांग्रेस !
राहुल गाँधी के कांग्रेस का भीष्म पितामह बनने के बाद कांग्रेस की सरकार ने देश को जो सबसे बड़ा और चर्चित काम करके दिखाया है,वह इस समय भारत में समलैंगिकता कानूनों का पारित होना है इस क़ानून के बन जाने से देश में अब धरा ३७७ समाप्त हो जायेगी और दो पुरुष या स्त्रियाँ मिलकर एक साथ पति-पत्नी के रूप में रह सकेंगे भारत की सरकार को इसमें फिलहाल कोई बुराई नज़र नहीं आती यह कानून एक तरह से देश को विकसित देशों की कतार में खडा करने की दिशा में भी सरकार का एक मज़बूत कदम हो सकता है जहाँ तक देश में इस कानून के पीछे हो रही बहस का सवाल है ,तो कहा जा सकता है की मीडिया की तो आदत है उसे कोई न कोई मुद्दा अपनी सुर्खियाँ बनाने को और वह हो रहा है सरकार भी इसीलिए चुप तक याद है, इस कानून की मांग करने वालों ने पिछले साल ही एक रैली निकालकर सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा था मान लिया भारत की सरकार अब उदार होती जा रही है दुनिया के तमाम मुल्कों में ऐसा कानून पहले से ही पारित है इसके साथ-साथ वहां और भी कुछ है, जिसको भारत में अभी लागू होना है मसलन एक पुरुष और एक महिला को भी एक से अधिक विवाह करने की छूट,गुजारेभत्ते का कानून, शादी की उम्र १८ और २१ साल से कम होना और मर्ज़ी से भागे प्रेमी युगलों के अभिभावकों के खिलाफ अपहरण का मुकदमा कायम न किये जाने जैसे कानूनों को भी लगे हाथ यह कांग्रेस की सरकार पारित करा दे तो मेरी नज़र में करोडों लोगों को खासकर युवों को अपनी मर्जी से रहने की आजादी मिल जायेगी आख़िर देश में अभी ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो अपने प्रेम को साकार करने के लिए १८ और २१ साल की उम्र पूरी करने का इंतज़ार कर रहे हैंखासकर अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के तमाम देशों में ऐसे हजारों स्कूली छात्राएं हैं जो छात्र होने के साथ एक माँ भी हैं इन देशों ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है और अभी नहीं तो कल वह दिन भी आयेगा जब इस तरह के लोग अपने अधिकारों के लिए समलेंगिकों की तरह आवाज़ उठाएंगे ही तब फिर से देश में बहस का माहोल बनाकर सरकार को कानून बनाना ही पड़ेगा आज के भारत में लाखों ऐसे दंपत्ति हैं जो किसी तरह अपना जीवन काट रहे हैं और समाज और कानून की मजबूरी के आगे बेबस हैं उनके रिश्तों में कोई मर्म और धर्म नहीं है बहुत बड़ी संख्या में ऐसे भी दंपत्ति हैं जिनका रिश्ता बचपन में ही तय हो गया और बड़े होने पर उनकी शादी कर दी गयी मगर ऐसे शादियाँ बेमेल बन गयीं और लोग रिश्तों का बोझा ढो रहे ऐसे परिवार आज न टूट रहे हैं और जुड़े तो कभी नहीं नतीजा उनकी आने वाली पीढियाँ भोग रही हैं मेरे विचार से इसमें कोई हर्ज़ नहीं है की सामाजिक परिवर्तन की दिशा में आगे आकर और जिस जल्दबाजी के साथ भारत की मौजूदा सरकार काम करने पर आमादा है ,उसे इन सारी परिस्थितियों पर गौर करना ही चाहिए सामाजिक परिवर्तन सामाजिक विकास की दिशा में सहायक हों और जितनी जल्दी इस तरह के कामों को निपटा दिया जाए तो सरकार के लिए अच्छा ही है आख़िर दुनिया के तमाम मुल्कों में भी तो समलैंगिकता के साथ यह सब होता ही है