संसद और विधानसभाओं में जाने के लिए अब इस देश में ऐसे होड मची है जैसे मानो मोक्ष की कल्पना साकार हो गयी अब बदलाव का दौर है रोजाना हर क्षेत्र में नए प्रयोग और नए नियम बनाये जा रहे हैं कार्यपालिका और न्यायपालिका को खुद अपनी अचार संहिता तय करने को कहा गया है वह कर भी रहे हैं विधायिका इस दौरान जो जो कर सकती है वह भी कर रही है मगर अमूमन जो देखने में आता है वह यह जन प्रतिनिधियों के लिए उनके भत्ते बढाने के अलावा और कोई नया कम यह सदन नहीं करते शायद हमारे देश में ऐसे कोई परम्परा नहीं रही है इस परम्परा का न होना कोई अभिशाप नहीं हैबहुत से ऐसे कानून हैं जो आज की जरूरतों के हिसाब से बनाये गए हैंकहने का आशय यह है कि अब समय आ गया है कि हमारे गणमान्यों और माननीयों को केवल सदनों कि कुछ निश्चित बैठकों में शामिल होने के अलावा और कोई जिम्मेदारी का अहसास नहीं है बहुत हुआ तो दो चार प्रेस कांफ्रेंस कर डालीं और किसी ने बता दिया तो सदन में सवाल लगा दिए आज के बदलते भारत कि जरूरत अब कहीं ज्यादा है अब वह समय आ गया है कि संसद और विधानसभाओं के इन माननीयों को जनता के और जिम्मेदार बनाने के लिए एक स्पष्ट और लिखित अचार संहिता बनायी जाये और इसको बनाने का कम मजुदा सांसदों और विधायकों कि एक संयुक्त समिति ही करे
आज सांसदों और विधायकों के लिए कोई ऐसे अचार संहिता न होने का ही परिणाम है कि यह खुद को जनता के प्रति उतना जिम्मेदार नहीं मानते जितना इनकी नैतिक जिम्मेदारी हमारे संविधान में है और जनता इनसे उम्मीद करती हैठीक चुनाव से पहले राज्नितिक्दालोम के दफ्तर ऐसे नजर आते हैं जैसे स्टॉक एक्सचेंज में सटोरियों का जमावड़ाआज बदलाव का दौर है युवाओं का दौर है
आने वाले भारत की तस्वीर हमें खुद ही अपनी कल्पना में बनानी है उसको अमली जमा पहनाने का काम भी यही तबका करेगा
क अजीब सा फैशन है जब भी चुनाव नजदीक आये और जिस किसी के पास भी ५-१० करोड़ रुपया हुआ बस माननीय बन जाने के ख्वाब देखने लगता है औए वाकई बन भी जाता है \बिना यह जाने कि जन्पर्तिनिधि बन जाने का क्या अर्थ होता है और क्या जिम्मेदारी होती है
इसा लगता है कि बस राजनीति में नए आने वालों कि यह कोई अंतिम इच्छा थी और बस इसके बाद जीवन सार्थक
यह स्थिति ठीक नहीं इस हालात को बदलने का यह सही समय हैमौजूदा विधायिका को अब इस प्रशन पैर विचार करना ही चाहिए कि यह अचार संहिता कैसे हो सांसदों और विधयाकों कि न्यूनतम जिम्मेदारी कैसे तय हो ,कैसे यह लोग खुद को ठीक उसी तरह जनता के प्रति जवाबदेह महसूस करें जैसे कि अफसरों से उम्मीद की जाती है अपने निर्वाचन क्षेत्र में नियमित दौरों के अलावा इनके चुनाव से पहले किये गए वायदों का कायर्काल पूरा होने के पहले मूल्याङ्कन किया जाये इसके लिए यदि चुनाव आयोग जैसे कोई संवैधानिक संस्था भी बनानी पड़े तो लोकतंत्र को गरिमामय बनाने के लिए यह कोई बहुत बड़ा नहीं एक सार्थक कदम कहा जायेगा
अन्प्रतिनिधियों को जनता के प्रति सीधे जवाबदेह बनाये रखने के लिए स्पष्ट निति और नियम होने ही चाहिए ,जिससे कम से कम इन लोगों को लोकसभा राज्यसभा और विधानसभाओं का महत्व पता लगे और चुनाव लड़ने से पहले इनको सोचना पड़े अभी तक कुछ को छोड़कर जन प्रतिनिधियों का एक बहुत बड़ा तबका ऐसे देश विदेश विहार करता है जैसे कि नारद जी पलक झपकते ही कहीं भी प्रकट हो जाते थे इस प्रवृति को जड़ से ही मिटाना होगा यह उच्चाधिकार प्राप्त आयोग केवल इन गणमान्यों के कार्यों का मूल्याङ्कन करे और उसी के अनुसार इनको दोबारा चुनाव लड़ने और न लड़ने या वापस बुलाने का भी अधिकार जनता को देने कि व्यवस्था की जायेसंसद और अन्य सदन आमोद प्रमोद के ठिकाने नहीं बल्कि जिम्मेदारी का स्थान है इनको यह अहसास हर समय करना ही पड़े