राहुल गांधी भारत की कक्षा में काफी समय से राजनीति का पाठ पढने और पढाने में व्यस्त हैं कभी कलावती की झोपड़ी और कभी अमेठी के एक टैक्सी ड्राईवर के साथ उसकी घर गृहस्थी का हाल-चाल लेकर भारतीय मीडिया में अपने लिए एक खास मुकाम बनाने के बाद उनकी कांग्रेस भी यह मान लेती है की बस राहुल के ही पदचिन्हों पर चला जाए तो बेडा पार ही है वर्तमान दौर में अब सिर्फ़ 'बॉस' की पूछ है वही आदर्श है वही आराध्य है वही अनुकर्णीय है यह कोई ख़राब परम्परा नही है इतना जरूर है की जब इस तरह के करने वालों की एक मजबूत और सशक्त जमात हो तो बस 'बॉस' को ही थोड़ा ख़याल रखना होगा इन पंक्तियों के जरिये मेरी राहुल गाँधी से यही अपेक्षा है क्यूंकि वह आज भारत के बॉस हैं
सरदार मनमोहन सिंह एक कुशल अर्थशास्त्री हैं इसमे कोई दो राय नही कि कीमतों को काबू में रखना उन्हें अच्छी तरह से आता है मगर आज देश का बहुत बड़ा तबका इस महंगाई से ठीक उसी तरह त्रस्त हो गया है जैसे कि कभी महाराष्ट्र में विदर्भ के किसान जान देने लगे थे मगर हैरत कि बात है अभी तक किसी भी स्तर पर महंगाई को काबू में रखने के बजाय अभी उन मुद्दों को छेड़ा जा रहा है जिनका इस देश के किसी भी जीव जंतु से कोई लेना देना नही है ,जैसे लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट इस रिपोर्ट के संसद में आ जाने या अखबार में छप जाने से न तो किसी कि भूख मिट जाती है और न कोई प्रभावित ही२० रुपए किलो का आट्टा खरीद कर भारत जैसे देश में जहाँ ७० प्रतिशत आबादी मध्यम वर्ग में आती हो कैसे गुजरा किया जा सकता कीमतों के खिलाफ हालाँकि लोग सड़कों पैर आने लगे हैं मगर सरकार के चिंता करने लायक हालत नही हैंऔर न ही मीडिया इस तरफ़ ध्यान दे रहा हैयह भी सही है कि इन सब के इस और ध्यान देने से कुछ होगा भी नही की मनमोहनसिंह चाहे तो महंगाई पर काबू नही पाया जा सकता हाँ !राहुल गाँधी के इस और थोड़ा सा ध्यान देने से जरूर फर्क पड़ेगा इसको एक दम व्यंग्य में न लिया जाए यह आज के भारत का कटु सत्य और यथार्थ है और इस बहाने rahul का आर्थिक मोर्चे पैर स्टडी भी अच्छा हो जाएगा
आखिर आज मोबाइल कि काल सस्ती है jamaana फ़िर एक पैसे पैर लौट के आ गया है कहाँ सरकार ने पाँच और दस पैसे का सिक्का बनाना ही बन कर दिया तब मोबाईल कि काल रेट एक पैसे पैर आ गई मगर इसका मतलब यह नही कि एक पैसे का जमाना आ गया है और देश में महंगाई नही रही इस बात को rahul गाँधी को अभी ही samajhna पड़ेगा