गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

दिल्ली में सरकार नीति से नहीं,नीयत से बनेगी।


दिल्ली की  त्रिशंकु विधानसभा देश के वर्त्तमान नीति  निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। उनकी परीक्षा की घडी है। समय का तकाज़ा है उन्हें  साबित करना होगा कि वह अब तक अपने हक़ में नीति निर्धारण करते रहें हैंया  जनमानस के  हक़ में यह करते रहे हैं या फिर वास्तव में वह  जनभावनाओ का सम्मान  करना चाहते हैं और दलीय स्वार्थ से हट कर देश और जनता के हित में सोचना चाहते हैं? दिल्ली के चुनाव के नतीज़े संवैधानिक प्रावधानों के हिसाब से कोई सरकार बना ने में भले ही सक्षम नहीं हैं, मगर यह नतीज़े क्या संवैधानिक प्रक्रिया से  प्राप्त जनादेश भी नहीं हैं ,इससे कैसे  इंकार किया जा सकता है?

 देश में व्यवस्था बदलाव के लिए जनमानस में  आक्रोशपूर्ण आतुरता के इस दौर में क्या अब भी हमारे नीति नियामक जनता के लिए संविधान की दुहाई देकर जनादेश को बदलने के लिए जनता पर फिर बोझ डालने से नहीं हिचकेंगे ?  इसके साथ ही  एक जनादेश को अपने पक्ष में बदलने के लिए आम मतदाता को यह अहसास करवाना चाहेंगे कि अपनी सरकार के लिए मतदान करते समय समय उन्हें केवल उनको ही और उनमे से ही किसी को चुनना है ? इसमें दो राय नहीं कि दिल्ली के नतीज़े जहां एक तरफ मौजूदा राहजनीतिक व्यवस्था और दलों की नीतियों से  घोर असहमति का क्रांतिकारी मूक ऐलान है और ऐसा भी नहीं है कि हमारे नीति नियामक इस मूक ऐलान की भाषा को समझ नहीं रहे हैं। वह समझ गए हैं।  मौन का उदघोष और भषा के कई गहरे और वृहत अर्थ होते हैं। और ऐसे में जहाँ बहुतायत का मत प्रकट होता हो वहाँ तो इसकी उपेक्षा या उस घोष को अपने अर्थों में बदलने का प्रयास कालांतर में काफीबड़ी चुनौती बनकर उभर सकता है ,इस तथ्य को नकारना एक बेवकूफी भरा ऐसा काम  भरपाई का भविष्य में कोई और तरीका खोजा भी नहीं जा सकता। औरवर्त्तमान जनादेश ऐसी ही एक क्रान्ति से उपजा है।

कहने का आशय है कि यदि दिल्ली की जनता ने स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के गठन का जनादेश नहीं दिया है तो क्या उसने अपने अपने लिए जन प्रतिनिधियों का चुनाव भी नहीं किया? इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि दिल्ली की ७० सदस्सीय विधान सभा के लिए वहाँ की जनता ने अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र से अपने लिए अपनी पसंद का प्रतिनिधि नहीं चुना है? जनता को अपने  प्रतिनिधि का चुनाव करना था ,सरकार का नहीं। सरकार बनाने का काम संविधान का है। संविधान के अनुपालन का काम संसद का है। और संसद को यह अधिकार भी संविधान ने दिया है कि  देश के जनादेश के हिसाब से वह उसमे संशोधन भी कर सकती है। और अब यह समय आ गया है है कि हम अपने साठ साल पुराने जनप्रतिनिधित्व क़ानून में आज के जन मानस की  अपेक्षाओं के अनुरूप संशोधान करें। दिल्ली के सन्दर्भ में यही एक मात्र विकल्प है।

क्या जरुरी है की दिल्ली में फिर से विधान सभा के चुनाव कराये जाएँ? बिलकुल नहीं। जनता ने विधायकों का चुनाव कर दिया है। सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला है। अब केवाल एक जनमतसंग्रह की जरुरत है, जो इस निर्णय के लिए होगा कि आखिर जनता किसकी सरकार चाहती है?"आप" की भारतीय जनता पार्टी की? आखिर इन्ही दो दलों को जनता  ने पसंद किया है।  और तीसरे कांग्रेस को एकदम नकार दिया है। अगर संविधान इसमें बाधक है तो संसद कानून बनाकर इस तरह का जनमत संग्रह कर सकती है।संविधान में इस तरह का प्राविधान न होने पर क्या अध्यादेश के जरिये ऐसे व्यवस्था नहीं की जा सकती? आखिर जनादेश से ऊपर तो संसद भी नहीं है। और न हमारा संविधान ! सारी  संवैधानिक व्यवस्थाएं और कानून केवल और केवल जनता और देश के लिए हैं,किसी व्यक्ति और दल के लिए नहीं!
आखिर जनता से उसके द्वारा एक बार चुने हुए जनप्रतिनिधियों का खुद ही ख़ारिज करके यह कैसे  कहा जा सकता है कि फिर से अपने प्रतिनिधि का चुनाव करे? खामी जनता की नहीं है। जनता द्वारा निर्वाचित उसके प्रतिनिधियों की सरकार बनाने के उस क़ानून में है जो जनादेश को अपने हिसाब से इस्तेमाल करने की छूट देता है ,और इस काम में वैचारिक रूप से अलग और धुर विरोधी विचारधारा के नाम पर सत्ता का बंदरबाँट कुछ ही लोगों को आपस में करने की  छूट देता है। दिल्ली में जनादेश  के अनुरूप सरकार बनाने का इस समय यही एक मात्र विकल्प है।सरकार बनाने  के लिये  जनमत की जरुरत है।  जनादेश तो आ चुका  है। मौजूदा नीति नियामकों के लिए यही परीक्षा की घडी है। उन्हें अपनी नीति और नियत का फर्क जनता को स्पष्ट रूप से बताना होगा। दिल्ली में सरकार नीति से नहीं नीयत से बनेगी।