गंगा को बचने के लिए पिछले साल आमरण अनशन कर चुके वयोवृद्ध पर्यावरणविद श्री जी डी अग्रवाल ने एक बार फ़िर गंगा के लिए संघर्ष का एलान कर दिया है मुज़फ्फरनगर से साइड स्टोरी को भेजी एक चिठ्ठी को हम यहाँ ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं :-
उत्तराखण्ड राज्य सरकार ने अपने 19 जून, 2008 के आदेश में भैरों घाटी तथा पाला-मनेरी जल-ऊर्जा परियोजनाओं पर तात्कालिक प्रभाव से कार्य रोक देने की और गंगोत्री से उत्तरकाशी तक भागीरथी गंगा जी के संरक्षण के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता की बात कही थी पर योजनाओं पर (विशेषतया पाला-मनेरी परियोजना पर) विनाशकारी कार्य भयावह गति पकड़ रहे हैं और उक्त आदेश माँ गंगा जी की और हमारी खिल्ली उड़ा रहे हैं। केन्द्र सरकार ने अपने 19 फरवरी, 2008 के पत्र में अपनी लोहारीनाग-पाला परियोजना पर तुरन्त प्रभाव से काम बन्द करने का आदेश दिया था। पर कार्य स्थल पर निर्माण कार्य तो अबाध ही नहीं, और भी त्वरित गति से जारी हैं। माँ गंगा जी को और हम सब को अंगूठा दिखाते हुए
चार नवम्बर, 2008 की प्रेस विज्ञप्ति में प्रधानमंत्री कार्यालय ने भारतीय जन-मानस और चिन्तन में गंगा जी के विशेष स्थान और भारतीयता के गंगा जी के साथ भावनात्मक जुड़ाव को स्वीकारने-बचाने की आवष्यकता पर बल देते हुए गंगा जी को भारत की ”राष्ट्रीय-नदी“ प्रतीक घोषित करने की पहल की। इसके पूर्व प्रधानमंत्री ने परम पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द जी के सामने "गंगा जी तो मेरी भी माँ हैं" और पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी के सन्मुख "गंगा जी तो भारत की आत्मा हैं" जैसे भाव प्रकट करते हुए गंगा जी के संरक्षण के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता जताई। पर सरकारी तंत्र ने माननीय प्रधानमंत्री की पवित्र भावनाओं का वैसा ही कबाड़ा किया और कर रहा है जैसा कि पूर्व में माननीय राजीव गांधी जी की भावनाओं, योजनाओं और आदेशों को किया था। मज़े की बात है कि प्रशासनिक तंत्र में किसी को भी इस प्रकार के जघन्य अपराध का कोई दण्ड मिलते न कभी देखा न सुना। बलिहारी इस सर्वशक्तिमान शासन-तंत्र की। 18 मई, 2009 का नैनीताल उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश केन्द्र सरकार में सचिव (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय) जो पदेन ”राष्ट्रीय नदी गंगा प्राधिकरण“ के सदस्य सचिव भी हैं, को या तो लोहारीनाग-पाला परियोजना पर कार्य जारी रखने के बारे में स्पष्ट निर्णय लेने या इस बारे में सलाह देने के लिये एक विशेषज्ञ दल गठित करने को कहता है और 4 सप्ताह के भीतर (या 15 जून तक) अपने उक्त आदेश के अक्षरशाः और सार्थक पालन की अपेक्षा करता है। पर अधिकारी वर्ग तो केवल वर्ग हितों के दबाव में काम करता है। उच्च न्यायालय या गंगा जी उसका क्या बिगाड़ लेंगे ? वह चिन्ता क्यों करें ? गत चार सप्ताह से मैं अपनी और गंगा जी की बात और तथ्यों की स्थिति माननीय प्रधानमंत्री तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ - सहानुभूति और आष्वासन की बात तो कई बार सुनी पर अन्ततः निराशा ही हाथ आई। इस झूठ, फरेब, धोखाधड़ी और निपट आर्थिक-भौतिक स्वार्थो से भरे माहौल में, जहाँ माँ गंगा जी की हत्या होते असहाय बने देखना पड़े़े, जीते रहना मेरे लिये दूभर हो गया है और मैंने रक्षा-बन्धन, 5 अगस्त, 2009 से अपना अनिष्चित कालीन उपवास पुनः जारी करने का निर्णय लिया है।
जी. डी. अग्रवाल