सोमवार, 9 दिसंबर 2013

फ़ोर्स के जवान ही श्रद्धालु और दर्शनार्थी बने !

अयोध्या का विवादित ढांचा। बाबरी मस्जिद। राम मंदिर। आखिर क्या है क्या था और क्या होगा यह सब भविष्य और कानून के गर्त में है। इस सवाल को हल करने कि इछाशक्ति भी धीरे धीरे समाप्त हो रही है। बिना राम मंदिर मुद्दे के सरकारें बन रही हैं। देश को जो चाहिए वह इस देश में कभी सोचा नहीं गया  और हाँ  नेताओं ने जरुर तय कर लिया कि देश को क्या देना है।
आठ दिसंबर १९९२ को अयोध्या के इस राममंदिर  में पुरानी इमारत ध्वस्त हो जाने के बाद इस पुरानी इमारत से तम्बू के मंदिर में फिर से पूजा अर्चना होने लगी और श्रद्धालुओं  में थोडा बदलाव हो गया। वैसे तो  अयोध्या वासी और देश प्रदेश के तमाम हिस्सों से रोजाना  ही बड़ी संख्या में लोग आते ही थे मगर छह दिसंबर से घोषित कारसेवा की वजह से अब जो श्रद्धालु थे उसमे वर्दी वाले स्त्री-पुरुष दोनों थे जो बड़े श्रद्धा भाव से श्री रामलला का दर्शन करके सर झुकाते थे। सुबह-शाम तो इन श्रद्धालुओं की  मंदिर परिसर में कतारें देखते ही बनती थी। यहाँ यही श्रद्धालु थे और यही सुरक्षा बल और यही लोग लगभग सूनी हुई अयोध्या में चहल पहल का एक मात्र कारण थे। जब भी फ़ोर्स के जवानों कि ड्यूटी बदलती थी और दूसरी  टोली मोर्चा संभालती थी तो  अधिकांश जवान पहले श्री राम लला को प्रणाम करते और बाद में मोर्च सम्भालते थे।